बस भी करो....
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बस भी करो....
खौल रहा हैं लहु मन ही मन में,
जाने रुकेगी कब कत्लेआम ये...
कब तक मासूम इंसानोंको युहीं ,
पड़ेगा धोना हाथ अपनी जानसे ...
बनकर काल मंडरा रहा हैं सरपर,
और दिलमें हैं दहशतका खौफ्फ़...
बेरहमीसे मरते इंसान को देखकर,
हलकसे ना निकले कैसे उफ़....
बस भी करो अब ये अत्याचार,
अबसे हम ना रहेंगे यूँ लाचार...
सर जुकाकर अब ना सहेंगे,
जवाब ईट का हम पत्थरसे देंगे...
* ख़ुशी *
* मैं ने देखा हैं...!!! *

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* मैं ने देखा हैं...!!! *
कोंहरेको चीरती हुई सूरजकी किरणों में,
जीने की नयी उम्मीद मैंने देखि हैं...
पवनकी सुर्ख़ियों में लेहरातें पेड़ पौंधों में ,
सप्तसुरकी जुगलबंधी मैंने देखि हैं...
समुंदर की उछलती लहेरों में,
माँ की ममता को मैंने देखि हैं...
चिड़ियों के घोसलें से चहकती आवाज़ में,
मासूम बच्चोंकी खिलखिलाट मैंने सुनी हैं...
आसमान में उड़ते पंछियो में,
आज़ाद इंसान को मैंने देखा हैं...
जलती हुई आग की लपेटो मैं,
इर्षासे जलते इंसान को मैंने देखा हैं...
शमा के पीछे फ़ना होते परवानो में,
देशभक्त सिपाही को मैंने देखा हैं...
फूलों पर मंडराते भवरों में,
लालची भ्रष्ट नेताओं को मैंने देखा हैं...
धगधगते लावा के रस में,
इंसान की वासना को मैंने देखि हैं..
आसमान में चमकते ध्रुव के तारे में,
बेईमानों में एक ईमानदार मैंने देखा हैं...
* ख़ुशी *












