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*Duniya Jalti Hai..*





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4 Response to "*Duniya Jalti Hai..*"

  1. "SURE" says:
    Aug 3, 2008 11:36:00 PM

    आँख भर आंसुओं से नहीं ये आग बुझने वाली
    मोम की बनी है ये दुनिया जो जलने वाली

    उठे सवालों की गर होती परवाह किसी को
    तो बात करता हर शख्स संभलने वाली

    जल रही किसी की ख़ुशी अरमान किसी के
    तेरी सोच, तेरी ख़ुशी से नहीं ये दुनिया बदलने वाली

    अमन का पंछी उड़ कर कहाँ बचेगा इस आग से
    पर उसके भी जला देगी ये आग दहकने वाली

    हमारी ही हवस से निकली चिंगारियों का असर है ये
    हम ही न बदले जब तक ये भी न समझने वाली

  2. "SURE" says:
    Aug 3, 2008 11:51:00 PM

    आप की रचना से प्रेरित हो कर उसके कमेन्ट लिखने बैठा था की कुछ और ही बन गया
    उसे एक अदद रचना मानने का दुस्साहस कर बैठा ,आप की आज्ञा लिए बगैर उसे "अभिन्न्कल्पना "
    ब्लॉग पर पोस्ट कर दिया .आपको कैसा लगा कृपया निसंकोच प्रतिक्रिया दें

  3. kabir says:
    Aug 4, 2008 12:01:00 AM

    dunia jal rahi jalne de
    pet kabira palne de
    aisi hi manodasha ho gai hai har insaan ki ,bahut firing thoughts hain aapke.keep it up

  4. Ranjeet Kr. Vimal says:
    Aug 10, 2008 6:49:00 PM

    jalne do.. :P