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बस भी करो....

                     
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बस भी करो....


खौल रहा हैं लहु मन ही मन में,
जाने रुकेगी कब कत्लेआम ये...
कब तक  मासूम  इंसानोंको युहीं ,
पड़ेगा धोना हाथ  अपनी जानसे ...
बनकर काल मंडरा रहा हैं सरपर,
और दिलमें हैं दहशतका खौफ्फ़...
बेरहमीसे  मरते इंसान को देखकर,
हलकसे  ना निकले कैसे उफ़....
बस भी करो अब ये अत्याचार,
अबसे हम ना रहेंगे यूँ लाचार...
सर जुकाकर अब ना सहेंगे,
जवाब ईट का हम पत्थरसे देंगे...

* ख़ुशी *

                                                          

4 comments:

Anonymous said...

मोतार्मा,आप के ख़यालात काबीलें तारीफ हैं किन्तु आपकी और नज़्म पढ़के हम इतना जरूर कहेंगे की आप और भी बहतरीन लिख सकती हैं

abhi said...

खुशी जी, सब तो यही सवाल कर रहे हैं की आखिर कब तक?

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

.


ख़ुशी जी
सादर अभिवादन !

नेट-भ्रमण करते हुए आपके यहां पहुंच कर हमें भी ख़ुशी हुई … :)
बेरहमी से मरते इंसान देख कर ,
हलक से कैसे न निकले उफ़....
बस भी करो अब ये अत्याचार,
अब से हम न रहेंगे यूं लाचार...
सर झुकाकर अब न सहेंगे ,
जवाब ईंट का हम पत्थर से देंगे...


…और रचना पढ़ कर ख़ून खौलने लगा …

जब तक प्रशासन श्रेष्ठ और कुशल तथा राष्ट्र के प्रति पूर्णतः समर्पित ईमानदार नहीं होगा , आम नागरिक जागरुक , नीडर और वोट का महत्व समझने वाले नहीं हो जाते … यह सब यूं ही चलता रहेगा …



जन जाग्रति के लिए लेखनी चलती रहे …
हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !
- राजेन्द्र स्वर्णकार

मलकीत सिंह जीत said...

http://ekprayasbetiyanbachaneka.blogspot.com/
इस ब्लॉग पर लड़के लडकियों के अनुपात में आते अंतर को रेखांकित करती कहानिया ,लेख ,समाचार ,या सुझाव ,चित्र आदि आमंत्रित है ब्लॉग में सहयोगी की भूमिका में भी आपका स्वागत है जिसके लिए टिपण्णी में जाकर अपनी प्रतिक्रिया के साथ अपना इ मेल आई दी भी छोड़े इस यज्ञ में आपके सहयोग रूपी आहुतियां अति आवश्यक हैं मलकीत सिंह जीत

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