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बस भी करो....

                     
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बस भी करो....


खौल रहा हैं लहु मन ही मन में,
जाने रुकेगी कब कत्लेआम ये...
कब तक  मासूम  इंसानोंको युहीं ,
पड़ेगा धोना हाथ  अपनी जानसे ...
बनकर काल मंडरा रहा हैं सरपर,
और दिलमें हैं दहशतका खौफ्फ़...
बेरहमीसे  मरते इंसान को देखकर,
हलकसे  ना निकले कैसे उफ़....
बस भी करो अब ये अत्याचार,
अबसे हम ना रहेंगे यूँ लाचार...
सर जुकाकर अब ना सहेंगे,
जवाब ईट का हम पत्थरसे देंगे...

* ख़ुशी *

                                                          

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